Friday, February 25, 2011

भारत और दुनिया का अर्थतंत्र

नमस्कार दोस्तों
एक गानाहैमहेंगायी दायाँ खाए जात हैसच हैलेकिन क्या ये महेंगायी किसी सरकार या किसी एक आदमी की वजह से है ? महंगाई है क्या ? कमाई के सामने गवाना ज्यादा उसे महेंगायी कहते हैअब ये महंगाई चालू कहाँ से होती हैऔर किस चीज़ से लोग सब से ज्यादा प्रभावित होते है
पहले बात बता देके इस महंगाई की असर भारत देश में इतनी नहीं है जितनी बाकि देशो में है
लेकिनअगर लोगो ने कुछ नहीं किया तो हालत यहाँ भी और ख़राब हो सकती है । (जी हाँ आप ने सही सुना लोगो ने ) ना की सरकार ने
अब बाकि देशो के सामने भारत की आज भी अछी हालत है उसका सबसे बड़ा ..कारन है भारत का अर्थतंत्र खेतीप्रधान हैमतलब आज भी भारत का ज्यादातर अर्थतंत्र खेती के उत्पादन पे है . और ये जो असर की में बात कर रहा हुवोकृषि से जुड़े लोगो की बेरुखीसरकारी नीतियों पे निर्भर रहना और सरकार से ज्यादा लाभ लेने की लालचयुवा वर्ग जिन की पुरखे खेती से जुडी हैअच्छी खेती की झमीन बेच के वो लोगकिसी और काम में लगने लगे है
और हाँपहले बता दूआप जो न्यूज़ में देखते हैकिसान की ये हालत और वो हालत
वो देश के कई हिस्सों में होगा लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात में मेने जितने किसान देखे वो स्वावलंबी और सुखी संपन्न लोग हैफिर भी जो १० % की हालत ख़राब हैउसेन्यूज़ में दिखाया जाता है
और वो जो लोग है वो इतने छोटे किसान है जिन के लिए सरकार कुछ करे लेकिन वहां के अमलदार और झामिंदर उन्हें ऊपर नहीं आने देंगे
किसी भी देश की पहेली झरूरत हैकृषि उत्पादन की चीज़ज्यादातर देश जिन में महंगाई बढ़ी है
जिसे अंग्रेजी में इन्फ्लेशन कहते हैवो सरे देशज्यादा तर अनाज के मामले में दुसरे देशो पे निर्भर है
उनकी कोई खुद की कृषि प्रोडक्ट इतनी नहीं हैऔर अगर है भी तोएक या दो ऐसी चीज़े जो ज्यादा काम आये और बाकि चीजों के लिए दुसरे देश पे निर्भर है
वर्ल्ड इकोनोमी से जुड़े लोगो की बात माने तो अगले १० साल अनाज ( जो की सबसे ज्यादा जरुरी है पूरी दुनिया के लिए ) के भाव कम होने के कोई चांस नहीं है
उसका मतलब हैअगर ठीक से हमारे यहाँ अनाज उगाना बांध हो गया तो अगले कुछ सालो में
भारत देश की भी वही हालत होगी जो बाकि देशो की हो रही है
गेंहू और चावल जो के सबसे ज्यादा झारूरी है दुनियाभर में भारत देश को उस मामले में आशीर्वाद है
और भारत देश की कृषि की क्षमता की कोई कमी नहीं हैझरूरत है तो भारत के कृषि से जुड़े लोगो को एक होने की और कुछ भी कर के उत्पादन क्षमता बढ़ाने कीचाहे सरकार मदद करे या करे
उसमे सिर्फ कृषि से जुड़े लोगो के अलावा जो कृषि से जुड़े नहीं है वो भी मदद करे
जेसे केउद्योगपति , बिल्डर , और सामान्य प्रजा जो के खेती की झमीन ले के उसे बिन खेती में परिवर्तित कर के उपयोग कर रहे हैवो बंध करे
उद्योगपति जेसे के रतन टाटाने सिंगुर से निकल केसानंद में गुजरात सरकार ने झमीन दील
वो जो झमीन है वो अछी खेती की झमीन थी रतन टाटाजो के कार बना चाहते थे वो किसी भी राज्य की बंजर झमीन पे अगर प्लांट लगतेतो देश को ज्यादा फायदा होता जिस प्लांट के लिए उन्हें १०० रुपये का खर्च हुआ वहा बंजर झमीन पे वो १०५ रूपये लगतेऔर हाँउन्होंने भी एक लाख में तो कार दी नहींतो उनके पांच % बचने के लिए सरकार ने भविष्य के १०० % जो हर साल मिलते और देश को ज्यादा मझबूत बनातेउसपे ब्रेक लगा दी ये बात सिर्फ एक कंपनी की नहीं है
ऐसा ही कुछ हिमाचल में उतराखंड में झारखण्ड में ऐसे और कई जगह हैजहाँ की झामिनो पे
खेती के उत्पादन के अलावा और कुछ होना ही नहीं चाहिए
गुजरात में वापी और अंकलेश्वर कर के इलाके है जहाँ सबसे अच्छी उपजाऊ झमीन हैलेकिन कैमिकल फेक्टरी इतनी बन चुकी है वहां और वो भी अपने १० % बचने के चक्कर में दुनिया भर का प्रदुषण यहाँ फेला रही है१० % किस बात केअगर पानी शुधि कारन प्लांट दाल के पानी को छोड़े तो झमीन या समन्दर में जाने वाले पानी में झाहेरिला केमिकल नहीं फेलेगाया अपने प्लांट ऐसी जगह ले जायेजहाँ की झमीन


More in next .. Post ......

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