एक गाना ॥ है ॥ महेंगायी दायाँ खाए जात है । सच है । लेकिन क्या ये महेंगायी किसी सरकार या किसी एक आदमी की वजह से है ? महंगाई है क्या ? कमाई के सामने गवाना ज्यादा उसे महेंगायी कहते है । अब ये महंगाई चालू कहाँ से होती है । और किस चीज़ से लोग सब से ज्यादा प्रभावित होते है ।
पहले बात बता दे ॥ के इस महंगाई की असर भारत देश में इतनी नहीं है जितनी बाकि देशो में है ।
लेकिन । अगर लोगो ने कुछ नहीं किया तो हालत यहाँ भी और ख़राब हो सकती है । (जी हाँ आप ने सही सुना लोगो ने ) ना की सरकार ने ।
अब बाकि देशो के सामने भारत की आज भी अछी हालत है उसका सबसे बड़ा ..कारन है भारत का अर्थतंत्र खेतीप्रधान है । मतलब आज भी भारत का ज्यादातर अर्थतंत्र खेती के उत्पादन पे है . और ये जो असर की में बात कर रहा हु ॥ वो । कृषि से जुड़े लोगो की बेरुखी ॥ सरकारी नीतियों पे निर्भर रहना और सरकार से ज्यादा लाभ लेने की लालच । युवा वर्ग जिन की पुरखे खेती से जुडी है । अच्छी खेती की झमीन बेच के वो लोग। किसी और काम में लगने लगे है ।
और हाँ । पहले बता दू । आप जो न्यूज़ में देखते है । किसान की ये हालत और वो हालत ।
वो देश के कई हिस्सों में होगा लेकिन महाराष्ट्र और गुजरात में मेने जितने किसान देखे वो स्वावलंबी और सुखी संपन्न लोग है । फिर भी जो १० % की हालत ख़राब है । उसे । न्यूज़ में दिखाया जाता है ।
और वो जो लोग है वो इतने छोटे किसान है जिन के लिए सरकार कुछ करे लेकिन वहां के अमलदार और झामिंदर उन्हें ऊपर नहीं आने देंगे
किसी भी देश की पहेली झरूरत है । कृषि उत्पादन की चीज़ । ज्यादातर देश जिन में महंगाई बढ़ी है
जिसे अंग्रेजी में इन्फ्लेशन कहते है । वो सरे देश । ज्यादा तर अनाज के मामले में दुसरे देशो पे निर्भर है
उनकी कोई खुद की कृषि प्रोडक्ट इतनी नहीं है ॥ और अगर है भी तो । एक या दो ऐसी चीज़े जो ज्यादा काम न आये और बाकि चीजों के लिए दुसरे देश पे निर्भर है ।
वर्ल्ड इकोनोमी से जुड़े लोगो की बात माने तो अगले १० साल अनाज ( जो की सबसे ज्यादा जरुरी है पूरी दुनिया के लिए ) के भाव कम होने के कोई चांस नहीं है ।
उसका मतलब है । अगर ठीक से हमारे यहाँ अनाज उगाना बांध हो गया तो अगले कुछ सालो में
भारत देश की भी वही हालत होगी जो बाकि देशो की हो रही है ।
गेंहू और चावल जो के सबसे ज्यादा झारूरी है दुनियाभर में भारत देश को उस मामले में आशीर्वाद है ।
और भारत देश की कृषि की क्षमता की कोई कमी नहीं है । झरूरत है तो भारत के कृषि से जुड़े लोगो को एक होने की और कुछ भी कर के उत्पादन क्षमता बढ़ाने की । चाहे सरकार मदद करे या न करे ।
उसमे सिर्फ कृषि से जुड़े लोगो के अलावा जो कृषि से जुड़े नहीं है वो भी मदद करे ।
जेसे के । उद्योगपति , बिल्डर , और सामान्य प्रजा जो के खेती की झमीन ले के उसे बिन खेती में परिवर्तित कर के उपयोग कर रहे है । वो बंध करे
उद्योगपति जेसे के रतन टाटा । ने सिंगुर से निकल के । सानंद में गुजरात सरकार ने झमीन दील
वो जो झमीन है वो अछी खेती की झमीन थी रतन टाटा ॥ जो के कार बना न चाहते थे वो किसी भी राज्य की बंजर झमीन पे अगर प्लांट लगते । तो देश को ज्यादा फायदा होता जिस प्लांट के लिए उन्हें १०० रुपये का खर्च हुआ वहा बंजर झमीन पे वो १०५ रूपये लगते । और हाँ ॥ उन्होंने भी एक लाख में तो कार दी नहीं । तो उनके पांच % बचने के लिए सरकार ने भविष्य के १०० % जो हर साल मिलते और देश को ज्यादा मझबूत बनाते । उसपे ब्रेक लगा दी ये बात सिर्फ एक कंपनी की नहीं है
ऐसा ही कुछ हिमाचल में उतराखंड में झारखण्ड में और ऐसे और कई जगह है । जहाँ की झामिनो पे
खेती के उत्पादन के अलावा और कुछ होना ही नहीं चाहिए
गुजरात में वापी और अंकलेश्वर कर के इलाके है जहाँ सबसे अच्छी उपजाऊ झमीन है । लेकिन कैमिकल फेक्टरी इतनी बन चुकी है वहां और वो भी अपने १० % बचने के चक्कर में दुनिया भर का प्रदुषण यहाँ फेला रही है । १० % किस बात के ॥ अगर पानी शुधि कारन प्लांट दाल के पानी को छोड़े तो झमीन या समन्दर में जाने वाले पानी में झाहेरिला केमिकल नहीं फेलेगा । या अपने प्लांट ऐसी जगह ले जाये । जहाँ की झमीन
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